शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

संयुक्त परिवार

होखे कबो झगड़ा
चाहे तकरार
ओहू में छलके
माई-चाची के दुलार
रहि-रहि सुनाला ओहिमे
हुँशियारी, नादानी
एक्के झगड़वा में
दस किस्सा-कहानी।
ऊ झगड़ा ना,
रहे रिश्ता के जहान
रोज नया रचे-बसे
उघटा-पुरान।
केहू पूछे
मिले केहू से जवाब
तबो सब पर चले
सबके हाँक-दाब।
कहे माई
मत करs
नया-नया खेल
छुछुन्नर के माथे
चमेली के तेल।
रचि-रचि करें धनि
सोरहों सिंगार
सगरे सिंगार
घेंघवे बिगाड़।
इचिको ना सहाव
चाची से ई चोट
बड़-बड़ बात करें
कs केs गोट-गोट
अरवा चाउर पर
भात डभकउआ
किने के ना दम बाटे
नाम हs बिकउआ।
बिगड़े बिटिअवा तs
कहेली नागरनाचीन
सात मुस खा के
बिलार भइली भगतीन।
केतनो झगड़ा रहे
बसल रहे तबो प्यार
अब ना ऊ घर बा
ना ऊ परिवार
ना बाड़ी माई-चाची
ना ओह रिश्तन के ताना-बाना
बदलत समइया में
बदल गइल जमाना।
नीको बात पर अब
गरे पड़ेला फाँसी
केकरा से आस करीं
बारी-के-बारी कोइलासी।
छोड़ीं बैर-भाव
काs बाs दूरी तकरार में
बड़ा ताकत होला
एगो संयुक्त परिवार में।
---केशव मोहन पाण्डेय---

शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

मांगलिक गीतन में प्रकृति-वर्णन

    लोक-जीवन में आदमी के सगरो क्रिया-कलाप धार्मिकता से जुड़ल मिलेला। आदमी एह के कारन कुछू बुझेऽ। चाहे अपना पुरखा-पुरनिया के अशिक्षा आ चाहे आदमी के साथे प्रकृति के चमत्कारपूर्ण व्यवहार। भारतीय दर्शन के मानल जाव तऽ आदमी के जीवन में सोलह संस्कारन के बादो अनगिनत व्रत-त्योहार रोजो मनावल जाला। लोक-जीवन के ईऽ सगरो अनुष्ठान, संस्कार, व्रत, पूजा-पाठ, मंगल कामना से प्रेरित होला। ई सगरो मांगलिक काज अपना चुम्बकीय आकर्षण से नीरसो मन के अपना ओर खींच लेला। एह अवसर पर औरत लोग अपना कोकिल सुर-लहरी से अंतर मन के उछाह प्रकट करेला लोग। औरतन द्वारा गावे वाला गीतन में अवसर के अनुसार वर्णन के विषय तऽ होखबे करेला, सथवे ओह लोक-गीतन के उछाह में प्रकृतियो के नइखे भुलावल जा सकत। मंगल कामना वाला ओह लोक-गीतन में प्रकृति के सुन्दरता के साथ बनल रहेला।   
साँच कहल जाला कि लोकगीत तऽ प्रकृति के उद्गार होला। साहित्य के छंदबद्धता आ अलंकारन से मुक्त मानवीय संवेदना के संवाहक के रूप में मधुरता बहा के आम आदमी के भी  तन्मयता के लोक में पहुंचा देला। लोकगीत तऽ सामान्य आदमी के सहज संवेदना से जुड़ल रहेला। ओह गीतन में प्रकृति के सौंदर्य के बड़ा बढि़या प्रस्तुति कइल गइल बा। प्रकृति के वर्णन बा तऽ मन-भावनी सावनी महीनो के वर्णन मिली। सावन के महीना में प्रकृति के हरिहरी भरल सुन्दरता चारू ओर परिलक्षित होला। आकाश में करीआ-करीआ बदरी देख के संयोगिनी औरत पेड़ पर झूला डाल लेली। ओह बेरा झूला झूलत जवन गीत गावल जाला, ओह के कजरी कहल जाला। कजरी में बेला-चमेली आदि के फूल फूलाइल बल्लरीअन के सुन्दर वर्णन मिलेला। रउरो देखीं ना, -
बेला फूले असमान
गजरा केकरा गरे डालीं जी।
    प्रकृति के संगीतमयी कहल जाला। जब प्रकृति गुनगुनाले तबे लोकगीतन के वास्तविक जनम होला। तरह-तरह के दृश्यन के सहज असर के कारने तऽ लोकगीत प्रकृति के रस में लीन हो जाले। कजरी, झूला, हिंडोला, आल्हा, गोधन, छठ आदि एकर प्रमाण हऽ। कातिक के अँजोरिया छठी के छठ व्रत कइल जाला। ओह अवसर पर निर्जलो व्रत रहला पर  औरत लोग भाव-विभोर हो के गीत गावेला लोग। ओह गीतन में धार्मिक मनोभाव उजागर होला। धरम के नाम पर प्रचलित विश्वास पारिवारिक विचार के बल देला। ऊहे पारिवारिक विचार, घरेलू निष्ठा आ आत्मा के संयम आदि छठ गीत के विषय हऽ। ओह गीतन में हर जगह कोंहड़ा, नेबूआ, केरा, हरदी, ओल, कोन, सुथनी आदि सामानन के वर्णन मिलेला। देखीं ना, -
कवन देई के अइले जुड़वा पाहुन,
केरा-नारियर अरघर लिहले।
     एगो चित्र अउरी देखीं। देखीं नाऽ, एगो भक्त परिवार छठ माई के पूजा करे नाव से घाट पर जाता। गंगा जी के झिलमिल पानी से चित्र और निखर जाता -
गंगा जी के झिलमिल पनीया
नइया खेवे ला मल्लाह,
ताही नइया आवेले कवन बाबू
ये कवना देई के साथ।
गोदिया में आवेलें कवन पूत
ये छठी मइया के घाट।। 
    सामाजिकता के जिंदा राखे खतिरा लोकगीतन में लोक संस्कृतियो के सहेजल जरूरी बा। कहल जाला कि लोकगीत ना रहीत तऽ पागलन के संख्या बढ़ गइल रहीत। एतने ना, लोकगीतन के कारने ही आजुओ सबके आपन गाँव-गिराव ईयाद आवेला। आजुओ ईहाँ के गाँवन में, जहवाँ छठ, पिडि़या, बहुरा, पनढरकऊआ आदि लोक व्रत-त्योहार लोक उत्सव के रूप में जीवित बा, ओहिजा प्रकृति भी जीवित बाऽ। शहर के गति से पिछुआइल लोक-गाँवन में सालो भर मौसम के अनुसार फल-फूल, साग-सब्जी के मनमौजी लता-लड़ी बेसुध होके घरन के छत-छान्ह पर पसरल रहेली आ अपना उन्मादल हरिहरी से मानव-मन के आकर्षित करत रहेली। सगरो मोहबे करेला। छठीए के गीत में एगो अउरी वर्णन देखीं, - 
केेरवा जे फरेला घवद से,
ओहपर सुगा मेरड़ाय,
सुगवा के मरबो धनुष से,
सुगाा गिरे मुरछाय।
बियफे के पूजा में केरा के पूजा होखे चाहें रोजो साँझि के तुलसी के पूजा, प्रकृति रानी सब जगह वर्णित रहेली। हर मांगलिक अवसर पर झुण्ड में औरत लोग जब गीतन के झूम-झूम के गावेला लोग, तऽ ओहके झूमर कहल जाला। झूमरो में तुलसी के वर्णन देखीं, -
अपने त जाले रामजी कासी नहाए
हमरा के छोड़ले महा जाल
अकेले जीअरा तुलसी के
छोड़ दिहले राम। 
    आदमी के जिनगी में बिआह सबसे प्रसिद्ध आ प्रधान संस्कार हऽ। संसार के सगरो जाति-संप्रदाय में ई संस्कार बड़ा उछाह से मनावल जाला। बिआह के मांगलिक बेला पर गावे जाए वाला गीतन में आनन्द आ उछाह के सथवे करूणा आ वेदनो के मिश्रण रहेला। वइसे तऽ दूल्हा-दुलहिन कीहाँ गावे जाए वाला गीतन में अंतर होला, बाकिर तबो प्रकृति के सानिध्य रहेला। सगुन के गीत में आम के पेड़ के वर्णन देखीं, -
अमवा के देखुअन मोंजरिया लिहले
चेरिया बलकवा लिहले
अरे, ओही रे सगुन राम गइले
सीता के लेअइले
कोसिला मनवा हरषित।
    राम जी मर्यादा पुरुषोत्तम के सथवे लोक-जीवन के महानायक हवें। मांगलिक गीतन में राम-कृष्ण के चर्चा जरूर होला। राम जी के बारात के आराम करे खातिर बरगद, आम आ महुआ के जुड़ल पेड़ अच्छा मानल जाला। देखीं एगो बिआह के गीत जेहमें सबके वर्णन बा, -
अमवा महुइया, बरगद जुड़ी छँइया
आरे जँहवा तेतर के ई गाछ
ऊहे दल उतरी।
    बिआह के विधान में चउथारी होला। ओह चउथारी में ईनार के साथे पीपरे के पेड़ के परिक्रमा कइल जाला। चउथारी के अलावा धार्मिको लगााव के कारन पीपर के पेड़ के वर्णन लोक-कंठ से खूबे होला। एगो वर्णन रउरो देखीं, -
हम चली अइनी बरम बाबा आस हे
दीं ना बरम बाबा अपने सुहाग हेऽ। 
    ध्यान से देखल जाव तऽ भोजपुरी में देवीओ-देवता से जुड़ल अनगिनत गीत मिलेला। आराधना करे वाला लोग अपना-अपना तौर-तरीका से अपना आराधक के कृपा पावे के बेचैन लउकेला लोग। ओह आराधक लोग पर आधारित गीतन में लवंग, इलायची, पान, सुपारी के वर्णन खूबे मिलेला। रउरो एगो देवी-गीत देखीं, -
सुन्दर बा सेनुरा
सुन्दर लवंगीया
सुन्दर बा पान-सुपारी
हे मइया!
खोलीं केंवाड़ी। 
     देवी माई के वर्णन होई तऽ नीम के वर्णन होखबे करीऽ। देवी माई नीम के डाढ़ पर आसन लगावत आ झूला-झूलत वर्णित होली। पचरा आदि में तऽ रउरो सुनले होखेब। एगो गीत देखीं, -
नीमिया के डाढ़ मइया
बइठे आसन मारी 
की झूली-झूली ना,
मइया गावेली गीत 
की झूली-झूली ना।।
    देवता में भगवान शिव सहज रूप से अपना पुजारी लोग पर प्रसन्न हो जाले। शिवजी के एही भोलापन के कारण भोला कहल जाला। भोला भंडारी के प्रसन्न करे खातिर भांग-धतूरा के जरत पड़ेला। देखीं, -
खोआ मलाई शिव के मनहीं ना भावे
भंगिआ के गोला कहाँ पाईं हो
शिव मानत नाही।
का ले के शिव के मनाईं हो
शिव मानत नाहीं।।
    ई कहल जाला कि भगवान शिव भांग के सथवे धतूरो पीए लेऽ आ मगन रहेलेऽ। अड़भंगी शिवजी के गीतन में धतूरो के वर्णन मिलेला। एगो उदाहरण देखीं, -
फूलवा लोढली गउरा
धतूरा तुरली गउरा,
पतवा लिहली सुरकाई 
ए शिव छोड़ दीं झीनी साड़ी।
    एकरा बाद शिवजी के बेलपत्तर भावेला। उनका स्तुति के बेलपत्तरो के वर्णन देखीं, -
पूड़ी-कचैड़ी शिव के मनहीं ना भावे
बेलवा के पात कहाँ पायीं हो
शिव मानत नाही।
का ले के शिव के मनाईं हो
शिव मानत नाहीं।।
    औरत लोग हमेशा दबावल गइल बा लोग। ओह लोग के गोड़ में कुल, खानदान, मान, मर्यादा, शील, सुभाव के बेड़ी लगावल बा, बाकिर अगर ईमानदारी से सोचल जाव तऽ औरत ना चहती तऽ लोकगीत एतना समृद्ध भइल रहीत? ई तऽ सभे जानेला कि अधिकांश लोकगीतन के रचइता लोग के नामे नइखे पता। एह हाल में अगर केहू सजोवले बाऽ तऽ ऊ हमरा-रउरा घर के नारीए बाड़ी। वर्तमान समय में आधुनिकता शहरन से हो केऽ भले गाँवन-देहातन के लोक-जीवन में आपन रंग जमा लिहले बाऽ, बाकिर अवसरे विशेष पर सही, आजुओ कहीं मांगलिक गीत सुनाला तऽ प्रकृति के विषद वर्णन आत्मा के तृप्त कऽ देला। मन के विभोर कऽ देला। एक बेर रउरो ध्यान तऽ देऽ के देखीं। ई पक्का बा कि राउरो मन अघाऽ जाई।
                                                      .........................

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

सांस्कृतिक संपन्नता के प्रतीक छठ व्रत

    अपना देश में देवी-देवता से लेऽ केऽ प्रकृति लेऽ पूजा-उपासना के परब-त्योहार मनावल जाला। ओही पर्वन में सूर्योपासना खातिर छठ के एगो अलगे महत्त्व हऽ। छठ व्रत सूर्य षष्ठी के होला जवना कारने एहके नाम छठ पड़ गइल। वैसे तऽ ईऽ पर्व साल में दू बेर मनावल जाला बाकिर कार्तिक शुक्लपक्ष के छठी पर मनावे जाए वाला ईऽ छठ सबसे प्रसिद्ध आ लोकप्रिय हऽ। परिवार के सुख-समृद्धि आ अनेक मनौतीअन के फल प्राप्ति खातिर ई पर्व मनावल जाला। ई पर्व मरद-मेहरारू सभे एक्के लखां मनावे ला। छठ व्रत के संबंध में ढेर कथा-कहानी सुने के मिलेला। ओहि में से एगो कहानी तऽ पांडवो लोग से जुड़ल बा। लोक-परंपरा के मानल जाव तऽ सूर्य देव आ छठी मइया के संबंध भाई-बहन के हऽ। इहो कहल जाला कि लोक मातृका षष्ठी के पहिलका पूजा सूरजे भगवान कइले रहले। अगर विज्ञान के आँख से देखल जाव तऽ एह छठ पर्व के परंपरा में बहुत विज्ञान बा। खगोल विज्ञान के मानी तऽ षष्ठी तिथि अपने आपे में एगो विशेष खगोलीय अवसर हऽ। ओह दिन सूर्यदेव के पराबैगनी किरीन धरती के तल पर कुछ अधिक मात्रा में जमा हो जाले। इहो कहल जाला कि परब के पालन से सूरूज के पराबैगनी किरणन के हानिकारक प्रभाव से जीव-जंतुअन के रक्षा संभव बा। सूरूज के किरीन धरती पर पहुँचला से पहिले वायुमंडल में प्रवेश करे से पहिले आयन मंडल से मिलेले। ऊँहवे पराबैगनी किरीन के उपयोग कऽ केऽ वायुमंडल अपना ऑक्सीजन तत्त्वन के संश्लेषित कऽ के ओकरा एलोट्रोप ओजोन में बदल देला। तब धरती पर एकर असर कम हो जाला। ज्योतिष के गिनती के अनुसार ईऽ घटना कार्तिक आ चइत मास के अमावसा के छह दिन बाद पड़ेला।   
     छठ चार दिन के परब हऽ। गोधन कूटइला के तीसरके दिन से आरंभ हो जाला। छठ उत्सव में छठ व्रत एगो कठिन तपस्या जइसन होला। ई मूलतः सूर्य के आराधना के पर्व हऽ। हिंदू धर्म में छठ के विशेष स्थान बा। सूर्यदेव के ताकत के मुख्य श्रोत उनकर पत्नी ऊषा आ प्रत्यूषा के मानल जाला। डुबत आ उगत सूरूज के पूजा मूल रूप से ऊषा आ प्रत्यूषा के पूजा हऽ। पुरानका जमाना में सूरूज के आरोग्यो के देवता मानल जाला। ई वैज्ञानिक साँच हऽ कि सूरूज के किरीन में अनेक बेमारी के दूर करे के क्षमता बा। कथा हऽ कि भगवान कृष्ण के पौत्र शाम्ब के कुष्ठ हो गइल रहे। एह रोग से मुक्ति पावे खातिर विशेष रूप से सूरूज देव के उपासना कइल गइल। कहल जाला कि एही खातिर शाक्य द्वीप से ब्राह्मण लोग के बोलावल गइल रहे, जे आज शाक्यद्वीपीय ब्राह्मण कहाला लोग।   
    एह तरे कार्तिक शुक्ल के छठी के दिने मनावल जाये वाला ईऽ पर्व हर तरह से एगो पवित्र पर्व हऽ। साँच तऽ ई हऽ कि पहिले एह व्रत के खाली औरते लोग करत रहल लोग, बाकिर अब बड़ तादात में पुरुषों लोग सहभागिता लेबे लागल बाड़े। जइसन कि पहिलहूँ कहल गइल बा, एह व्रत के सबसे अधिका उद्देश्य बेटा पावल, बेटा के दीर्घायु भइल रहल बा बाकिर आज तऽ ई व्रत सगरो कामना के पूरा करे खातिर मनावल जाला। आज के समय में ना बेटा-बेटी में भेद रहल आ ना छठ के एगो उद्देश्य। सच्चाई तऽ ई हऽ कि छठ माई के ई पावन व्रत भगवान भाष्कर के व्रत हऽ। भगवान भाष्करे के अर्घा देहला के बाद व्रती लोग पारण करेला लोग। छठ व्रत के विधि का हऽ, ओकर सगरो विधान पूजा करत, तैयार करत के अवसर पर गावे वाला गीतन में सोंझहे लउके ला। सँचको बात ईहे हऽ कि लोक-उत्सवन के असली उमंग तऽ ओह अवसरन पर गाए जाए वाला गीतवन के विविध रंग से ही फूटेला। अदितमल से अरज करत औरत जब अपना दयनीय दषा के वर्णन करेली तऽ सुनहूँ वाला के करेजा पसीजे लागेला। एगो गीत रउरो देखीं ना, -
                                            काल्ह के भुखले तिरियवा
                                            अरघ लिहले ठाढ़ऽ।
                                            हाली-हाली उग ये अदितमल,
                                            अरघा जल्दी दियावऽ।। 
    छठ व्रत में पारना के एक दिन पहिले वाला साँझ के बेरा डुबत अदितमल के, आ ओह दिन उगत अदितमल के, व्रती अर्घा अर्पित करेला लोग। सूर्य देव के अर्घा देबे के प्रक्रिया नदी, पोखरा आ तालाबन के किनारे पूरा कइल जाला। छठ के गीतन में गंगा जी के स्वच्छ आ झिलमिल जल के वर्णन मिलेला। एगो चित्र देखीं। देखीं ना, एगो भक्त परिवार छठ माई के पूजा करे नाव से घाट पर जाता। गंगा जी के झिलमिल पानी से चित्र और निखर जाता -
                                           गंगा जी के झिलमिल पनीया
                                           नइया खेवे ला मल्लाह,
                                           ताही नइया आवेले कवन बाबू
                                           ये कवना देई के साथ।
                                          गोदिया में आवेलें कवन पूत
                                          ये छठी मइया के घाट।।
    लोक-जीवन के एह महान उत्सव खातिर कुछ दिन पहलहीं से सामानन के व्यवस्था होखे लागेला। ई लोक-व्यवस्था के समरसता देखीं कि छठ पूजा में लागे वाला अधिकतर सामान प्रकृतिए के गोद से मिलेला। या तऽ ऊऽ सब प्रकृति देवी देली आ नाहीं तऽ कृशि आधारित होला। कहीं से केरा, कहीं से नेबुआ, कहीं से दही, सेब, सिंघाड़ा, ऊँख, हरदी, आदी, कोंहड़ा, चिउरा, ओल, सुथनी। ईऽ सगरो सामान आस-पड़ोस, सगा-संबंधी से मिल जाला। छठ के गीतन में तऽ ईहो वर्णन मिलेला कि घरे आवे वाला हीतो-नात अरघा के सामान जुटावेला लोग। देखीं नाऽ,  -
                                     कवन देई के अइले जुड़वा पाहुन,
                                     केरा-नारियर अरघर लिहले।
    भारत के लोकमन ईहाँ के मटिए जइसन उर्वर आ निर्मल बाऽ। जेऽ तरे लोग के पावन मन में अनगिनत लालसा के जनम होला, ठीक ओही तरे भारत के मटीओ पर किसिम-किसिम के फल-फूलन के ऊपज होला। भारत के धरती अनगिनत फल-फूल, धन-धान्य से भरल धरती हऽ। ई रतनन से भरल वसुन्धरा माई हमनी के सबकुछ दे देलीऽ। हर तरह से संपन्न करेली। हमनी के सुख-दुख, हँसी-खुशी, उछाह-उमंग, सबके ध्यान राखेली। आजुओ ईहाँ के गाँवन में, जहवाँ छठ, पिडि़या, बहुरा, पनढरकऊआ आदि लोक व्रत-त्योहार लोक उत्सव के रूप में जीवित बा, ओह मौका खातिर सामानन के व्यवस्थवो सोंचल जाला। शहर के गति से पिछुआइल हमनी के गाँवन में कातिके-अगहन नाऽ, सालो भर मौसम के अनुसार फल-फूल, साग-सब्जी के मनमौजी लता-लड़ी बेसुध होके घरन के छत-छान्ह पर पसरल रहेली आ अपना उन्मादल हरिहरी से मानव-मन के आकर्षित करत रहेली। कवनो गाँव में चलऽ जाईं, हर जगह लौकी, कोंहड़ा, घेंवड़ा, तिरोई आ चाहें नेबूआ, केरा, हरदी, ओल, कोन, सुथनी के आकर्षण लउकेला। सगरो मोहबे करेला, - 
                                      केेरवा जे फरेला घवद से,
                                     ओहपर सुगा मेरड़ाय,
                                     सुगवा के मरबो धनुष से,
                                     सुगाा गिरे मुरछाय।
    लोक जीवन! माने सहजता के जीवन। एह सहजता में अपनत्व बाऽ, प्रेम बाऽ आ अमरख बाऽ। व्रत-त्योहारन के अवसर पर गावे जाए वाला गीतीयनो में लोक-जीवन के आशीष, प्रेम, अपनत्व, सहयोग, समरसता के सथवे अमरख आ गरीओ के स्वरूप मिल जाला। बाउर नजरी के डरो लउकेला, -
                                  काँच ही बाँस के बहँगिया
                                 बहँगी लचकत जाय।
                                 बाट जे पूछेला बटोहिसर
                                 ई बहँगी केकरा घरे जाय?
                                आँख तोर फूटो रे बटोहिया
                                ई बहँगी कवन बाबू के घरे जाय।। 
    छठ के गीतन के सांस्कृतिको पक्ष अद्भुत बाऽ। कहीं पार्वती माता शिवजी की फूलवारी से फूल तुरत लउकेली तऽ कहीं मालीन अपना काम में लीन। सभे श्रद्धा के भाव से छठ माई के पूजा-अर्चना में लीन भइल रहेला। अगर छठ माई के व्रत-पूजा के सामानन के व्रत-पूजा कहल जाव तऽ कतहीं से गलती ना होई। एह व्रत में हर किसीम के सामानन के व्यवस्था कइल जाला। एह व्रत में समाजिक सहयोग के कवनो सीमा ना रहेला। ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, छोट-बड़, आपन-बीरान के सगरो भेद-भाव के आडंबर से परे हो के सभे उत्सव के सहयोग में जुट जाला। आनन्द आ उछाह के निमित्त बन जाला। सभे सबके मंगल के याचक बन जाला। एगो गीत देखीं ना, - 
                                महादेव के लगाावल फूलवरिया
                                गउरा देई फूल लोढ़े जाँय,
                               लोढ़त-लोढ़त गउरा धूपि गइली
                              सुति गइली अँचरा बिछााय।
    आज के बेगवान समाज के बौद्धिक स्तर भले ऊँच होऽ ताऽ, बाकिर सथवे आज के जन मानस में बेटा-बेटी के प्रति सोच बदलत लउकता। आज के समय में खाली सुहाग के जोड़ा, बाँह में चूड़ी, माँग में सेनूर लगवले में नारी के नारीत्व पूरा ना होला। पहिले तऽ बेटा खातिर औरत लोग कवनो उद्यम करे खातिर तैयार रहत रहे लोग, आज बेटा-बेटी में भेद के सोंच बदलल बा। ई सोच औरते लोग के कारन बदलल बाऽ। सचहूँ औरत लोग अदम्य साहस के अक्षय-कोश हऽ लोग। एक औरत के चित्रण देखीं जवन संतति खातिर छठ मइया के रास्ता रोक लेत बाड़ी, - 
                             छठी मइया चलेली नहाये
                            बाझीन रोकेली बाट, 
                            कवन अयगुनवा हमसे हो गइले
                            बाझीन पडि़ गइले नाम?
    अब रउरा एगो अउरी औरत के रूप देखीं जवन खाली पाँच गो बेटा पाऽ के संतुष्ट हो जइहें। छठ के गीतन में ईहो मनोभाव देखे के मिलेला, -
                            खोंइछा अछतवा गड़ुअवा जुड़ पानी,
                            चलली कवन देई अदितमल मनावे।
                           थोर नाहीं चाहीं अदितमल, बहुत माँगीले ना,
                           पाँच पूत ये अदितमल हमरा के देतीं।
    भले आज अत्याधुनिक सभ्यता आ श्रेष्ठ शिक्षा के चमत्कार के कारन अपना प्राचीन धारणा आ विश्वासन में वैज्ञानिक आ तार्किक परिवर्तन भइल बाऽ, बाकिर लोक-संस्कृति के कलकल करत नदी के धारा आजुओ अपना पहिलके गति से बह रहल बाऽ। लोग आजुओ ओही तरे छठ के व्रत राखता आ अपना मन के कामना के पूरा होखे खातिर छठ माई के विधिवत पूजा-व्रत राखत बा लोग। एही कारने देष में रोज राजनैतिक, सामाजिक आ आर्थिक व्यवस्था के साथे धार्मिक परिवर्तन होऽ ता तऽ काऽ, आजुओ छठ मइया के प्रति आस्था बढ़ते बुझाता। खाली बुझाते नइखे, सच्चाइयो सिद्ध होऽ ता कि छठ संस्कृति के संपन्नता के व्रत हऽ। छठ सांस्कृतिक संपन्नता आ वैभव के व्रत हऽ। छठ पावनता के व्रत हऽ।
                                                                     ................
                                                                               - केशव मोहन पाण्डेय

सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

ए अरिआर का बरियार

     आजु जीउतिया हऽ। जिउतिया के शुद्ध नाम ह जीवित्पुत्रिका माने जे जीअत पुत्रन के माई होखे। कुआर महीना के अन्हरिआ के अष्टमी के ई तप-पर्व पड़ेला। माई लोग अपना लइकवन खातिर निर्जला व्रत बाऽ लोग। जीभ पर एगो बूंद पानी ना। बेटा खातिर ई व्रत एगो तपस्या कहल जाला। आजु एह तपस्या के अवसर पर हमके हमरा माई के ईयाद आवता। भोरहरिए से माई के ईयाद आवताऽ। आज सभे सरगही खइले होई। हमार मेहरारूओ खइली हऽ। ना ऊ कबो उठावेली आ ना हम उठेनी। बाकिर हमार माई! ..... जबले हम गाँवे रहि के पढ़नी, हर साल हमार माई हमरा के उटावे। बाबूजी मना करते रहि जासु, बाकिर माई जिद्द कऽ देस। घर के सबसे छोट लइका, उठे ना दीं। उठावस। ओहि बेरा दतुअन करवावस आ अपना सथवे बइठा के दही-चिउड़ा के सरगही खिआवस। आजु अपना घरनी के देखनी हँ तऽ ऊ घरी इयाद आवे लागल हऽ आ इयाद आवे लागल हऽ कि आजु जीउतिया हऽ। बेटा के जुग-जुग जीए खातिर माई के व्रत।

     पुत्र के दीर्घायु के कामना के व्रत हऽ जीउतिया। नहाय खाय के बाद आज औरत लोग के निर्जला व्रत चल रहल बाऽ। महतारी के ई तपस्या तऽ संतान के दीर्घायु आ रक्षा खातिर होला। अगर धर्मशास्त्रन के देखल जाव तऽ ऊँहवो एह व्रत के विशेष महŸव मिलेला। एह व्रत खातिर जन मान्यता तऽ ई ह कि औरत लोग बरियार के दतुअन आ खर करेला। एह व्रत में महतारी लोग जेतने खर करेला लोग, उनकर बेटा ओतने दीर्घायु होले। आजु के दिन तीजहरिया में महतारी लोग नहा-धो के देवी दुर्गा के विविध विधि से पूजा करी लोग। एतने ना, जीउतिया तप-पर्व के  दिने बरियार के पौधा अनगिनत माई लोग के सन्देश-वाहक बनेला। आज के दिने बरियार के पौधा जोह के ओहके चारू ओर साफ़ क के एगो विशिष्ट दूत के जइसन सजा दिहल जाला। महतारी लोग अक्षत-रोली-फूल से पूजा क के भेंट-अँकवार करेला लोग। बरियार के पौधा से भेंट-अँकवार करत सीधे प्रभु राम के सन्देश भेजेला लोग -
                 'ए अरियार का बरियार 
                 जा के राजा रामचन्द्र से कहि दीह 
                 आज फलनवा के माई जीउतिया भूखल बाड़ीऽ।’
   आज हमरो माई जँहवा होइहें, जवना हाल में होइहें, हमरा खातिर उनकर आशीष बरसत होई। आज ऊहो बरियार के अँकवार में भर के कहत होइहें कि जा के पूछऽ केशव मोहन के माई से, कि जीउतिआ भूखल बाड़ी?। 
     अपना संतानन खातिर व्रत-तपस्या करत महतारी लोग तऽ महान बड़ले बाऽ, महान बा आपन लोक-संस्कृति, आपन पहचान। ईमानदारी से कहल जाव तऽ महान लोक-संस्कृति के महन बनवला में महतारीए लोग के महातम बाऽ। प्रभु से प्रार्थना बा कि ओह लोग के आषीश संतानन के साथे भाषा आ संस्कृति के रक्षा खातिर भी मिले।
                                                        ......................
                                                                        - केशव मोहन पाण्डेय

रविवार, 27 सितंबर 2015

जनम के उछाह में सोहर के सरसता


    लोक साहित्य कवनो संस्कृति से ढोवे वाला सबसे सहज माध्यम होला। बिना कवनो रोक-टोक आ बिना कवनो बान्हा के अलिखित रूप में कवनों समाज के जन-जीवन के सुन्नर आ सहज झाँकी लोकगीतन के माध्यम से प्रस्तुत होला। साँच बा कि लोकेगीत से लोक जीवन के साँस कायम रहेला। ई लोकगीत में अपना-अपना जवार के आपन-आपन पहिचान आ विशेषता के साथे जन-मानस में विद्यमान पावल जाता। एह लोकगीतन के चमत्कार त ईऽ होला कि खाली शब्दन के हेर-फेर से स्वरुप बदल जाला बाकिर भाव के ताकत ऊहे रहेला। लोकगीतन के गावल होखे चाहें सुनल, एहसे लोक जीवन के समृद्ध आ आनन्ददायक जीवन के सिरजना होखे लागेला। लोक-जीवन में लोकगीतन के माध्यम से परिवार, समाज, देश के सुख-दुख, जग-परोजन, दशा-दुर्दशा, पीड़ा-उछाह, जीअन-मरन, मेल-मिलाप, रिश्ता-नाता जइसन सगरो व्यक्तिगत आ व्यावहारिक पक्षन के साथे जिनगी के यात्रा में साथ निभावत रहेले। लोकगीतन से जीवन जीए के ढंगो आवेला, सीखो मिलेला आ आदर्शो स्थापित होला।  
    जगत के शाश्वतता आ जीवन्तता जिनगीए के कारण बा। धरती पर जीव बाड़े त जिनगी में सगरो रंग बा। सनातन धर्म के मानी तऽ एह मानुष जीवन में सोलह गो संस्कारन के बात कहल जाला। हमनी के लोग जीवनो में ओह संस्कारन के बड़ा आदर बा। लोक-जीवन के सगरो आचार-विचार ओह संस्कारन से पे्ररित आ नियंत्रित भइला के साथहीं सजलो-सँवरल लागेला। ओह संस्कारन के पावन बेला पर मन एगो दोसरे उल्लास आ आनन्द से भर जाला। ओह उछाहन के व्यक्त करे में लोक-जीवन से सबसे ताकतवर आ सहेजे वाला गृहिणी लोग के आस्था, निष्ठा आ विश्वास सबसे अधिका रहेला। लोक-जीवन में संस्कारन से गुजरत हमरा-रउरा आ सबका घर के ईआ, नानी, माई, फुआ, बहीन, बेटी, सभे सबसे पहिले जुमेला लोग आ अपना कोकिल-कंठ से गीतन के वीणा बजा के स्वर के रस के बौछार से मन के आह्लाद व्यक्त करेला लोग। ऊ लोग अपना गीतन से जीवन के संस्कारन के अउरी रंजक बना देला लोग। संस्कारन से समाज अपना रीति-नीति के अनुसार संस्कारित होत रहेला। ओह अवसरन पर कुछ विशेष विधि-विधान, पूजा-पाठ कइल जाला, कुछ लोकाचार निभावल जाला। ई लोकाचार, ईऽ संस्कार पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होत रहेला। ओह संस्कारन के अवसर पर गावल-बजावल, नाचल, स्वाँग भरल, हँसी-मजाक, छेड़छाड़ कइल जिनगी में अउरी रंग भर देला। 
    सधवा नारी के गोद भरल रहे, ईहे भारतीय सोच के चरम परिणति होला। ओह गोद में बेटा खेलत रहे, एकर इच्छा तऽ आउओ व्याप्त बा। सगरो समाज में अधिकता में रहबो करेला। पुंसवन संस्कार के बाद जब घर में जन्म होला तऽ परिवार, जाति, बिरादरी, टोला, मोहल्ला में उमंग छा जाला। जनम के प्रसन्नता तब खाली बाप-महतारी के ना हो के सगरो परिवार के संगे सबके हो जाला। सामाजिक प्रसन्नता हो जाला। ओह अवसर पर जवन गीत आस-पड़ोस, घर परिवार के काकी-चाची, फुआ-दीदी गावे ला लोग, ओह के सोहर कहल जाला। सोहर के कतहूँ-कतहूँ मंगल भी कहल जाला। पुत्र के जनम लेहला पर बारह दिन, माने बरही ले ई गीत गावल जाला आ बालक के बरही के साथवे एकर समापन होला। सामान्य रूप से ओह सोहर के तीन गो रूप मिलेला - (1) देवता जगावन, (2) सोहर आ (3) खेलवना।
    जब केहू के घरे बेटा के जनम होला तऽ दाई चाहे महरीन घर के बाहर निकल के फूलहा चाहे पितल के थरीया हँसुआ से बजावे लागेली। ओह थरिया के आवाज सगरो टोला-मोहल्ला में सबके कान में जा के एक बात के ऐलान करेला कि फलाने के घर में वंश के बढ़ोत्तरी हो गइल बा। कि ओकरा साथवे मानव-वंश के बढ़ोत्तरी हो गइल बा। ऊ थरिया बजावल सुन के आस-पड़ोस, घर परिवार के सगरो काकी-चाची, फुआ-दीदी जुम के देवता जगावे लागेली। ओह देवता जगावन के पित्तरो नेवतल कहल जाला। काकी-चाची, फुआ-दीदी अपना गीतन के माध्यम से अपना पिŸार माने पूर्वज लोग के नाम ले-ले के ई सूचना देला लोग कि देखीं लोगीन, हमनी के अपना गीत से ई शुभ सूचना देत बानी जा कि रउरा सभे के आत्मा के शांति बदे तर्पण करे वाला रउरा कुल में धरती पर जनम ले लेहले बाड़े। हे देवता लोग, हे पित्तर लोग, रउरा सभे ओह जनमतुआ के आगमन पर आनंदित हो के आशीष दीं लोगीन। ईहे सूचना देत गीत के गुँज सुनाए लागेला -
आवहू गोतिया रे आवहु गोतिन आरे...ऽऽ 
गाई के जगावहू 
शिवमुनि बाला कि
जनमे ले नाती नू होऽ। 
एगो दोसरा उदाहरण से सोहर के मंगल रूप के पता चल जाता। ऊ मंगल गीत बहुत हद ले देवता आ पित्तर लोग से सुनावत होला। देखीं ना, -
गावहू ए सखी गावहू
गाई के सुनावहू होऽ 
आरे, सब सखी मिली गावहू
आज मंगल गीत नु होऽ।। 
देवता जगवला के बाद पतरा में शुभ बेला देख के लगन निश्चित कइल जाला आ ओह निश्चित लगन पर सोहर गावल जाला। साँझे, राते, बिहाने चाहे दुपहरिया, कवनो बेरा मेहरारू कुल ‘सुतिका-गृह’ के दुआर पर बइठ के सोहर के अमरीत वर्षा से गाँव-जवार के साथे अपना संस्कारन के समृद्ध करे लागेला लोग। मेहरारू लोग सोहर गावे खातिर ‘सूतक-गृह’ के दुआर चाहें आस-पास के स्थान एह से चुनेना लोग कि गीतीया प्रसूता के साथवे नवजातो के कान में पड़े। एहके मानसिक मान्यता होला कि सोहर सुनला से जच्चा-बच्चा दूनो जने के स्वास्थ्य लाभ मिलेला। हमरा बुझाला कि भले स्वास्थ्य लाभ मिलत होखे चाहे ना, बाकी एही बहाने रोचक संगीत तऽ सुने के मिलबे करे ला। -
बाजन बाजे सत बाजन
नउबती बाजन होऽ
ऐ जी, राजा राम लीहले अवतार 
अयोध्या के मालिक होऽ।
बरही माने लइका जनमला के बारह दिन पर के कार्यक्रम। ओह दिन ले रोजो, कवनो बेरा, जबे साँस मिले, मेहरारू लोग जुम के सोहर गावेला लोग। आजुओ तऽ पुत्र-प्राप्ति उत्सवन के प्रधान मानल जाला। ओह अवसर पर पँवरिया लोग के गावल आ नाचल तऽ होखबे करे ला, जुमल मेहरारूओ लोग नाचे-गावेला लोग। एह अवसर पर नाचे-गावे के प्रथा आदि से चलत आ रहल बा। अपना रामायण में महर्षि वाल्मीकि जी राम जी के जनम पर अप्सरा लोग आ गंधर्वन के नाचे-गावे के बात लिखले बानी। ‘जगुः कल च गंधर्वाः ननृतुश्चाप्सरो गणाः।’ अपना ‘रघुवंशम्’ महाकाव्य में आदिकवि कालिदास जी भी लिखले बाड़े कि राजा दिलीप के महल में ‘अज’ के जनम लेहला पर वेश्या लोग नाचत-गावत बा। ‘सुखश्रवाः मंगलत्य्रनिस्वनाः प्रमोद नृत्यैः सह वारयोषिताम्’। ओही तरे बेटा जनमला पर अपनीहों गाँव-जवार में सुने के मिलेला। एगो फिल्म में प्रयोग भइल ई पारंपरिक गीत देखीं -
जुग जुग जियसु ललनवा, 
भवनवा के भाग जागल होऽ,
ललना, लाल होइहे, कुलवा के दीपक 
मनवा में आस लागल होऽ।
ई देखे के मिलेला कि सोहर में अधिकतर राम-कृष्ण के जनम से संबंधित गीत होखेला। सोहर गीतन में वण्र्य-विषय के विविधतो पावल जाला। कुछ सोहरन में महतारी ना बनला के टीस रहेला त कुछ में गर्भावस्था में कुछ विशेष खाए-पीए के अभिलाषा आ कुछ में पुत्र जनम के आह्लाद के साथही देवी-देवता के पूजा-पाठ के कथा-प्रसंग। ई सगरो सोहर के विविध रंग हऽ, जवना में बधाई सूचक सोहरे गावल जाला। ‘सोहर’ के उत्पत्ति जाहें जेऽ तरे भइल होखे, पुत्र के आगमन पर होखे वाला एह गीतन के छंदओ ‘सोहरे’ हऽ। सोहर गावे खातिर कवनो बाजा के जरुरत ना पड़ेला। एह खातिर ना ढोलक के थाप चाहीं, ना झाँझ के झोंझ रहेला। भोजपुरी के सोहर के बारे में विद्वान लोग के ई मत हऽ कि ऊ तुक आ नियम से परे होला। भाव व्यक्त करे खातिर बान्हा कइसन? भोजपुरी के सोहर कवनो पहाड़ी नदी जइसन स्वछंद आ धारदार होला। हमरा माई के ई पसंदीदा सोहर रहे। देखीं ना -
माथे मुकुट कृत कुण्डल
ओढले पीताम्बर होऽ
माई होऽ, 
बाँसुरी बजावत कृष्ण जनमे ले 
मोरा कोखी आवेले होऽ।।
सोहर के गीतन में संभोग शृंगार के वर्णन के सथवे आनन्द आ उल्लासो के अद्भुत वर्णन मिलेला। ओह गीतन में सद्यः माई बने वाली औरत के मन के गुदगुदावे वाला शब्दन आ गीतन के अधिकता होला। अइसनके गीतन के ‘खेलवना’ के नाम दिहल जाला। एह सोहरन में पति-पत्नी के संबंध में कबो-कबो पड़े वाला खटास के साथे देवर-भाभी के पावन संबंध के उजागर कइल जाला। एह तरे के अनेक  बिम्बन के सिरिजना कऽ के अनगिनत सोहर भोजपुरी में गावल जाला। हम अइसहूँ अपना माई से बेर-बेर सोहर गवा-गवा के ओहके रिकार्ड क के आॅडियो रखले बानी, जवन अब खराब हो ता आऽ इर्ऽ लेख लिखत बेरा अंतर-मन से ईयाद आवता। माई के गावत सोहरन में कई गो ‘खेलवनो’ सुनले बानी। देखला पर मिलेला कि सोहर के विषय के विस्तार के तुलना में खेलवना में संक्षिप्तता रहेला। देखे के मिलेला कि एह खेलवना से नया उमीर के बहू-बेटी लोग के ज्ञान दिआला। खेलवना में लइका जनमला से घर में आइल खुशहाली, बधाई, नेग-चार आदि के सथवे ननद-भौजाई के हँसी-ठिठोली के मिश्रण रहेला। एगो उदाहरण देखीं -
बबुआ रुन मुन झुन मुन 
अंगना सोहावन अइले नाऽ
अपना बाबा के खरचा करावन अइले ना नाऽ।
अपना दादी के चोरिका लुटावन अइले नाऽ।।
सोहर में गुदगुदी के एगो दोसरो चित्र देखीं। एहसे पता चल जाता कि लोक जीवन में प्रकृति के बिना कवनो जग-परोजन, कवनो उछाह-अमरख के कल्पना नइखें हो सकत। -
चकवा जे पुछेले हुनहुन
कब होइहें झुनझुन
कब होइहें होऽ।।
सोहर गीतन में पति-पत्नी के रति-क्रीड़ा, गर्भाधान, गर्भिणी के शारीरिक बनावट, दोहद, प्रसव-पीड़ा, महरीन चाहें धगडि़न के बोलोवला से ले के पुत्र के जनमला ले के भी वर्णन होला। एकरा सथवे कई जगह ईहो वर्णन मिलेला कि प्रसव-पीड़ा के बेरा पत्नी अपना पति-परमेश्वर से दूर ना रहेके चाहे ले। राम-सीता के वर्णन पर आधारित ईऽ सोहर देखीं नाऽ -
राम चलेले रथ साजि के
केहू देखहूँ ना पावेला होऽ
अरे, सीता कहेली कर जोरि
हम रउरा साथे चलेब होऽ
ए साहेब,
अंतर-वेदना के ई बतिया
हम केकरा से कहेब होऽ।।
गर्भवती स्त्री जवन-जवन चीज के खाएके विशेष इच्छा व्यक्त करेले ओहके ‘दोहद’ कहल जाला। कालिदास जी स्पृहावती वस्तुः केषु मागधी में एकर वर्णन कइले बाड़े। अइसनका वर्णनन में ईहो मिलेला कि सुन्नर-बेटा के जनम देहला पर दोसरो औरत प्रसूता से ओहिसनके बेटा पावे के उपाय पूछेले। राम जइसन बेटा के देख के सुमित्रा पूछेली। देखीं -
हँसी-हँसी पुछेली सुमित्रा रानी
सुनहू बहिना कोसिला नु होऽ
ए बहिना
कवन-कवन व्रत कइलू
रमइया पुत्र पवलू नु होऽ।।
सोहर के गीतन में छेड़छाड़ आ गुदुरावे वाला गीतन के अधिकता भइला के साथवे छोट-मोट कथो-कहानी के वर्णन मिलेला। एह तरे के अनेक सोहर गीतन से भोजपुरी भाषा अउरी समृद्ध होले आ सथवे भोजपुरी के लोक-साहित्य के अमर धरोहरन में भी बढ़ोŸारी होला। बातचीत, कथा-कहानी परिवार के हर सदस्यन के सथवे पति-पत्नीयो के बीच देखे के मिलेला। देखीं ना -
पिया पीअर 
पिया पीअर के हमरो साध
पीअरिया हम चाहिले होऽ।
धनि नइहर
धनि नइहर लोचना भेजवाव
पीअरिया तुहूँ पहिर नू होऽ।।
बेटा जनमला पर ‘पँवरीया’ नाचेला लोग। ई पँवरीया अधिकतर मुसलमान होला लोग, जे भगवान राम के कथा के गा-गाके नाचेला लोग। अब तऽ पँवरीया लोग के नाच-गाना भरे मेटाऽ ताऽ बाकी जब ऊ लोग ढोलक पर कुकुही (एक तरे के बाजा) के मधुर संगीत से आपन राग मिला-मिला के गीत जब गावेला लोग तऽ मन में उछाह भर जाला। अपना गाँव-देहातन में, जहाँ सोहर के गीत आ पँवरीया के नाचन के प्रथा, भले दूबरे हालत में सही, जीअऽता, ओहिजा के रम्यता देखते बनेला। हम लइकाईं में अपनदा दुआर प पँवरीया लोग के नाचल-गावल देखले बानी आ ऊऽ चित्र आजुओ आँख में बसल बाऽ। सोहर गीतन में पँवरीया लोग के भी वर्णन मिलेला। एगो उदाहरण देखीं -
दुअरा पर नाचेला पँवरीया
तऽ अंगनवा कोतकवा नाचे होऽ,
आरे, ओबरी में नाचे ले ननदीया
तऽ होरीला कहि-कहि के होऽ।
आरे, दे दऽ भाभी अपने कंगनवा
ललन के बधइया लेबऽ होऽ।।
बधइया या नेग लेबे में फुआ सबसे आगे होली। फुआ, पँवरीया, महरीन, धंगडि़न आदि लोगन के नेग मँगला के वर्णन सोहर गीतन में भरपूर मिलेला। नेग माँगे के बेरा तऽ हर जनमतुआ राम-कृष्ण आ हर माई कोसिला-यशोदा हो जाला लोग। एगो धंगडि़न के नेग माँगला के वर्णन देखीं -
मचिया ही बइठल कोसिला रानी,
बड़की चउधराइन होऽ,
ए रानी, हम लेबो सोने के हँसुआ
त रुपवा के खापड़ी होऽ।
पहिरी ओढि धगडि़न ठार भइली,
चउतरा चढ़ी मनावेली होऽ 
आरे बंस बाढ़ों रे, फलाना राम के घरवा
बरिसे दिन हम आइब होऽ।।
लोक-जीवन के विडंबना देखीं कि जहाँ बेटा के जनमला पर उत्सव मनावल जाला, ऊहवें बेटी के जनमला पर विषाद फइल जाला। सोहर में कई जगह एकर वर्णन मिलेला कि महतारी कहेली कि जे तरे पुरइन के पतई बेयार के काँपेला होही तरे बेटी के जनमला पर हमार करेजा काँपऽता। कहल जाला कि एही कारने बेटी के जनमला पर सोहर ना गावल जाला। कई जगह बेटी-जनम के पीड़ा भी व्यक्त भइल बा। रउरो देखीं ना -
जेठ बइसखवा के पुरइन 
लहर-लहर करे एऽ,
आरे, ताहि कोखी धिअवा जनमली 
त पुरुख बेपछ परले एऽ। 
मइले ओढ़न, मइले डासन, 
कोदो चउरा पंथ भइले एऽ,
आरे, रेंडवा के जरेला पसंगिया, 
निनरियो नाहि आवेले एऽ।
स्त्री लोग के भाग्य पर अटूट विश्वास होला। ऊ जानेला लोग कि भगवान के जो कृपा होई तऽ कपार से बाँझिन नाम के कलंक मेटाऽ जाई। भोजपुरी सोहरन में भारी-से-भारी बिपतन में औरतन के धैर्य के रेखांकित कइल गइल बाऽ। कई जगह ई देखे के मिलेला कि अपने उमीर के औरतन के गोदी में नवजात के देख के दोसर औरत अपना संतानहीन भइला के व्यथा में आहत हो जाले। सोहर गीतन में तऽ बंध्या औरतन के दशा के अइसन वर्णन मिलेला कि पत्थरों के सीना के झँकझोर देलाऽ। ओह तरे के सोहर में सास के दुव्र्यवहारो के वर्णन मिलेला। एगो सोहर देखीं -
मचीआ बइठल मोरे सास,
सगरी गुन आगर हेऽ।
ए बहुअर,
उठऽ नाहीं पनीआ के जावहू
चुचुहिया एक बोलेले हेऽ।।
अपना बाँझपन से औरत एतना परेशान बिआ कि गंगा जी से जा के गोहार लगावत बिआ। एगो सोहर देखीं -
गंगाजी के ऊँच अररवा,
तेवइया एक रोलवे होऽ।
आरे गंगा, अपनी लहरिया हमके देतू तऽ 
हम डुबि मरि जइति होऽ।।
पुत्र के जनम पर देवता आ पूर्वज लोग के गोहराऽ के ओह लोग के धन्यवाद ज्ञापन कइल होखे चाहे आशीष देबे के कामना होखे, चाहे वंश-वृद्धि के चर्चा, ईऽ सब देवता जगावल कहाला। पुत्र के प्राप्ति के इच्छा रखे वाली औरत, गर्भ के वेदना से व्याकुल तरुणी, पतोह के मंगल कामना में लागल सास, दौड़-दौड़ के धंगडि़न बोलावे में व्यस्त पति देव, बेटा के जनमला पर धन-दौलत के नेग माँगे वाली महरीन, कूद-कूद के आपन उछाह लुटावत ननद आदि के वर्णन सोहर के गीतन में बहुते होला। नवजात के रोआई, माई के आनन्द, सास के प्रसन्नता आदि के वर्णन खेलवना के वण्र्य-विषय हऽ। एह सब के अलग-अलग कइल कठिन होला। कुल मिलाके देवता उठावन के बाद बेटा के जनम के पूर्व-पीठिका के वर्णन सोहर में होला तऽ उत्तर-पीठिका के वर्णन खेलवना में।
भले समाज में परिवर्तन होऽ ताऽ, लोक-जीवन भी संस्कारन के चादर के समय-समय पर धोऽ के साफ-सुथरा करे के चाह राखता, आ करतो बाऽ। दुनिया विकास के पाँख लगा के लंबा उड़ान भर रहल बिआ। दूरी काऽ कहाला, ई तऽ बुझाते नइखे। अब तऽ सगरो सफर एगो क्लिक पर निर्भर हो गइल बाऽ। समाज में परिवर्तन के सथवे नित नया-नया आंदोलन के जनम होता। आधी आबादी के विशेषण पर नारी-मुक्ति के बात कइल जाता। तबो सोचे वाला बात ई बाऽ कि आजुओ बेटा के जनम उछाह के संचार करे में कवनो कसर नइखे छोड़त। भले समय के साथ चलत लोग-जीवन में भी लइका के जनम के सोहर अब सूतक-गृह से चल के नर्सिंग होम के बेड पर चल गइल बा, तबो अभीन कईगो ईया-नानी, कईगो फुआ-काकी बाऽ लोग जे संस्कारन के जीअवले बाऽ लोग। ऊ लोग जानत बाऽ लोग कि अपना डुबत संस्कारन के बचा के ही अपना वैभवशाली संस्कृति के समृद्ध कइल जा सकल जाला आ ढोल-नगाड़ा वाला गोलबाजी से दूर अपना असली भोजपुरिया के परिचय दिहल जा सकल जाला। काहे कि कवनो लोक-जीवन के लोक-साहित्य ओह लोक-मानस के हृदय के अभिव्यक्ति होला। लोक-साहित्य लोक-मानस के भावना के सँचका दर्पण आ प्रतीक होला। तऽ सबके सोचे के चाहीं कि हमनी के कहाँ बानी जाऽ, काऽ करऽ तानी जाऽ आ काऽ करे के चाहीं।
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                              - केशव मोहन पाण्डेय

सोमवार, 24 अगस्त 2015

करनी के फल


    महंथ जेतने सीधवा हवें ओतने ईमानदारो हवें। दगाबाजी से कई कोस दूर रहेलन बाकीर करीको करेजा के लोग से साधुए नीयर बतीआवेलन। ऊ सोचेलन कि सभे अपना करनी के फल भोगबे करेला, तऽ हम आदमी होऽ के काहें आपन परलोक बिगाड़ीं।   
    गाँवन में ई ढेर देखे के मिलेला कि तनीक लउके भर जमीनो वाला आदमी भी मोट गुने मतवा बनल रहेला, बाकीर महंथ में ई कवनो ओर से झलकबो ना करेला। गाँव के कई जाना उनसे ईर्ष्या रखेला लोग, बाकीर सगरो जानते हुए भी उनकर मन गंगा जल बनल रहेला। महंथ जेऽ तरेऽ खाये-पीये में मन बदलत रहेलन, ओही तरेऽ खेतीओ में कई रंग देखावेलन। ऊ मानेलन कि धरती माई के हँसी में ही किसानन के खुशी छुपल रहेला। पुरखन के आशीष से उनके लगे पाँच बिघा जमीन बा। . . पछिम टोला में सबसे अधिका आ सबसे ऊँचास पर। सबसे हलगर आ सबसे ऊपजाऊँ। सबके फसल जब बरसात के खीस आ गंगा माई के पेट में पड़ जाला, बाकीर महंथ के खेत खातीर आशीष हो जाला। ऊ पैतालीस-पचास के होत होइहें, बाकीर मलिकाइन ललिता के कोख टाँड़े रहलऽ। उनका मन मारला पर महंथ ढाढस देलन, - ‘प्रभु के नजर होई तऽ तहरो अँचरा मँहकी ललिता। . . खाली एतना देखत रहीहऽ कि केहू दुआर से मन थोर कऽ के नाऽ जाव। . . भले अपना खातिर सीधा-बारी ना होखे तऽ का हऽ, दोसरा के भूख ना माराव।’ 
    ललिता अपने पति परमेश्वर के ई भावना पर कबो सीना फूलावेली तऽ कबो तरस खाली। मने मन बुदबुदाली, - ‘ई जुग में अइसन सीधवा आदमी! . . तबो ऊपर वाला किरपा नइखन करतऽ।’
    महंथ खातीर ई सगरो गँउवे आपन परिवार हऽ। गाँव के सगरो लइका आपने संतान हँवे सों। लइकन के हँसी-किलकारी बटाइल बा काऽ? लइकन से कवन द्वेष? लइकन से कवन बैर? लइका तऽ भगवान के रूप होले। भगवान खातीर के आपन, के बीराना? . . काऽ भगवान कबो केहू से बैर कइले बाड़े कि हमनी के करेऽ के चाहीं? . . ऊ एही भाव के मनका मन में घूमावत सबेरे-सबेरे लाठी कंधा पर ले केऽ खेत आ टोला के एक चक्कर जरूर लगावे ले। खेत घूमत अइहें तऽ सबसे हाल-चाल लेत अइहें तले किरीन कपार पर आ जाई। ललिता के भी काम बटाइल बाऽ। उठते धवरी के नाद पर बान्ह के झाड़ू-पोंछा में लाग जाली।  
    ललिता आ महंथ के ईऽ छोटका संसार मन में मसोस रखला के बादो बड़ा गदगद रहेला। ओह लोग के प्रसन्नता ओह लोग के देखतहीं लउक जाला। दिल एक दम दर्पण। मन में ना कवनों मइल, ना कवनो मलाल बा। ना तिरछोलई राखेला लोग, आ ना भावेलाऽ। मन के साथे-साथे भगवान ओह लोग के तनो स्वस्थ देहले बाड़े। सुहाग के निरोग से ललिता भी निरोग रहेली। महंथ तऽ ऊपर वाला के प्रसाद समझेलन। उनकरो चेहरा पर अजीब चमक रहेला। चेहरा चौड़ा तऽ बड़ले बाऽ, सीना भी छौ फूट्टा जवान जइसन चौड़ा बाऽ। कजरौटा के आभा लिहले आँख में एगो अद्भूत चमक रहेलाऽ। बड़का बाल वाला मोंछ पर बिना बनवलहीं ताव रहेला। उनकर बनावट आ डीलडौल देख के बड़का-बड़का अनुभवी लोग भी चकमा खा जालें। आज ले केहू उनकर सही उमीरीए ना बतावल। गरदन में करीआ डोरा में कपड़ा के ताबीज आ कंधा पर एगो गमछी महंथ के एगो अलगे पहचान बनावेलाऽ। 
    ललिता मझीला काठी के एगो सुघर गृहिणी हई। गोर भभुका आ गोल-मटोल चेहरा पर उनके भंटा जइसन बड़की आँख उनके और आकर्षक बना देले। भरल देंह पर प्रीत के भाव ओह नारी के नारीत्व के निखार हऽ। आज एहू उमीर के केहू के नजर ललिता के रूप पर तनी डंडी मारीए लेबे के चाहेला। ऊहो मन में हमेशा ईश्वर के गुणगान करेली आ पति के परमेश्वरे जइसन आदर देलीऽ।
    सावन के झपसा अपना जवानी पर बाऽ। आपन करीका मुँह लेहले बादर आकाश से धरती रानी के निहारत बाड़े सों आ लहलहात हरियाली देख के अपनो भूमिका पर खुशी लुटावत बाड़े सों। झपसा में लसीआइल रसगर हवा ओह बादरन के अपना अँगुरी के ईशारा पर मनमौजी उड़ावत बिआ। गाँव से तनी बहरी भइला पर जेने देखऽ ओनहें, धरती धानी चुनरी में सजल बाड़ी आ तरह-तरह के फसलन के खेती से साज-सिंगार कइले बाड़ी। बरगद के पतइन में लुकाइल कोइलर कबो बोलावत बिआ तऽ कबो उतरही गड़हा के किनारे से पपीहा के पुकार सुनाताऽ। आम के अन्हारी बारी में बगुला अपना खोंता पर पाँख फैला के रखवारी करत बाड़ें सों तऽ कबो अमरूद के गाछ पर बइठल मिट्टू राम टें-टें कऽ के हूँ में हूँ मिलावत बाड़ें। 
    महंथ अपना खेत के किनारे बइठ के खुश होत बाड़े आ मने मन मुस्कातो बाड़े। ऊ एतने खेतवा में कहीं मकई बोअले बाड़े, कहीं एके में रहर आ कोदो, तऽ कहीं मोथ-बाजरा, आ बाकी में धान। महंथ दूर से ही जाटा के एनहे आवत देखलन तऽ मन में कुछ खटका भइल। जाटा उनका खातीर कबो भलाई ना चाहेलन। ऊ गरज पड़ला पर महंथे से ही पँइचा-उधार लेत रहे लेऽ बाकीर हमेशा उनकर नुकसाने चाहेले। सगरो टोला काऽ, पूरा गाँव जानेला कि उनका मन में महंथ खातीर काई रहेला।
    जाटा के एक बिघा जमीन बाऽ बाकीर एगारे गो भँइस पोसले बाड़े। सात गो छोट से बड़ ले बेटा आ दू गो बेटी। घर भर भँइसन के सेवा में लागल रहेला आ ओकनीए के परताप से निमन चिकन चलेला। उनकर तीनो बड़का बेटा साइकिल पर शहर में जा के दूध सप्लाई करेलें सों। ऊ जब लगे अइलन तऽ महंथ आपन अदब ना भूलइलन। आवते पूछलन, - ‘एह साल फसल के का हाल बाऽ जाटा भाई?’
‘गंगा माई नाराज ना होइहें तऽ नगदे कटी एह साल।’ - जाटा कहत रहलन, - ‘बाकीर तहार फसल तऽ बड़ा लहर मारताऽ। एह साल तऽ तहरा दू-चार गो अउरी बखार बनवावे के पड़ीऽ।’
    ‘ई सब तहार आशीष आ गंगा माई के छोह बाऽ। . . तहार नजर रही तऽ जरूर बखार बनी।’
    ‘हमार नजर तऽ बड़ले बाऽ भाई।’ - जाटा बड़ा तिरछोलई से कहलन आ करीका मुस्की मारत चल दिहलन।     किरीन के पछिम जाए के बेरा आइल तऽ फेर से सावन के लड़ी लाग गइल। महंथ घरे आवत-आवत चभोराऽ गइलन।
    सावन के ऊ लड़ी तीन-चार दिन ले चलल आ एही में महंथ के बुखार धऽ लिहलस। बुखार के कारण ऊ खेतन के दर्शनो करे ना जाऽ पइलन। आज जाऽ के मौसम तनी साफ भइल हऽ तऽ इनकरो जीव टूकटूकाइल हऽ। मन हरिहर होते लाठी कंधा पर धऽ के चल दिहलन। अभीन दू-चारे डेग बढ़ल रहलन कि निजमवा आइल, - ‘ए काका! . . अरे मर्दवा, . . तू एहीजा बाड़ऽ आऽ तहरा खेतवा में आठ-दस गो भँइस पड़ल बाड़ी सों।’
    महंथ से छाती भाती जइसन तेज-तेज चले लागल। उनका कदम में मोटर के गति हो गइल। धावत गइलन। कई बेर गोड़वो बिछलाइल। लाठी ना रहीत तऽ मुँह फूट गइल रहीत। खेत देखलन तऽ कपारे हाथ धऽ के बइठ गइलन। सगरो खेत सफाचट हो गइल रहे। सफाचट ना, ऊ तऽ चरावल रहे। काहें कि खेतवा में आदमीयो के गोड़ के चिन्हा लउकत रहे। भँइसन के खुर के पिछा कइलन तऽ चिह्न जाटा के दुआर ले आइल रहे।
    ऊ घटना के एक हप्ता हो गइल। पीड़ा तऽ ढेर भइल। अपना मेहनत आ अपना खेत पर भइल एह अत्याचार के एगो बाउर घटना समझ के भूलाए के चहले। ललिता के आँख से तऽ लोर के लड़ीए ना सूखे। महंथ हिम्मत देहले कि जेऽ जइसन करीऽ, ओके ओही तरेऽ फल मिली। बसल घर, हरिहर खेत आ मधुमक्खी के बास उजाड़ल सबसे बड़का पाप हऽ पाप। भगवान सब पाप अगर एक बेर माफो कऽ दिहें तऽ एह पाप के ना माफ करीहें। . . दूनो परानी के दिल कई टुकड़ा हो गइल रहे। ओह लोग के नाऽ घर के काम में मन लागे, ना बहरी केऽ। धवरीयो कई दिन से भर गाल कुछ खइले ना रहे। धवरी के ईयाद आवते ललिता उठली कि रवीन्दर चैबे कई लोग के साथे दुआर पर जुम गइले। महंथ पूछलन, - ‘काऽ बात हऽ चौबे जी?’
    ‘खेत खाय गदहा आ मार खाय जोलहा तऽ सुनले रहनी, बाकीर ई काऽ हऽ महंथ?’
   ‘कहवाँ का हऽ चौबे जी?’
   ‘तहार खेत तऽ गोरू चरऽ गइलें सों, . . तऽ अपना गइया खातीर हमार धनवा काहें कटलहऽ हो संत बाबा?’ 
   ‘काऽऽ? . . ई काऽ कहऽ तानी चौबे जी?’
   रवीन्दर छँटकट्टा मशीन के लगे से एक पाँजा अपना खेत के काटल धान उठाऽ ले अइले। ई देख के महंथ पानी-पानी तऽ हो गइले, बाकीर ई खेल ना बुझाइल। पाछे से जाटा के मुस्की मारत देख के उनका नजर के भाषा पढ़ लिहले बाकीर कह ना पवलन।  
    गाँव में महंथ के जवन प्रतिष्ठा पहिले रहल, ओह पर अब बट्टा लाग गइल रहे। महंथ अब एगो छोट लइको से नजर मिलावे के साहस ना बटोर पावें। उनका करेजा में एह घटना से बड़ा गहरा घाव लागल रहे। एह चोट के दवाई कवनो बैद-जराह लगे ना रहे। उनकर मन अब कोठे-कोठे दउड़े लागल। कहीं चैन ना मिले। पता ना कवना करनी के सजा भगवान देत बाड़े। दोषी मस्ती में बा आऽ निर्दोष कुफुत में। काऽ हे भगवान? . . कब अँजोर होईऽ? . . हम तऽ ओह गलती के सजा भोगत बानी, जवन कइलहीं नइखीं। अब तऽ लागताऽ कि ईऽ घर-दुआर, ईऽ गाँव-नगर छोड़ले में भलाई बाऽ। एहीजा तऽ हम पटपटाइए जाएब। भगवान एको संतान ना देहले तऽ आपन किस्मत ठोक लेहनी। घर में केहू अउरी सहारा नइखे तबो किस्मत ठोंक लेहनी। बाकीर ई तऽ पानी मुड़ी से ऊपर बहे लागल। ना हम केहू से कुछ कहि सकतऽ बानी आऽ ना केहू सुनी। ना हमरा लगे जाटा के कवनो सबूत बा आऽ ना हमरा चाहींऽ। रहे जेकरा खुश रहे के बाऽ। हमार करेजा जराऽ के केहू चैन से नइखे रहि सकतऽ। . . . महंथ एकदम मन बना लिहलें कि अब ऊ ई गाँव छोड़ के कहीं अंते बस जइहें। बेचारू अब ना हाटे जास, ना खेत-खलिहाने। दिन भर दुआरी पर बइठल रहस। उनका में अब खेतवो में जाए के साहस ना रहे। अब ललिते खेत देखे जात रहेली।   
    कई दिन बाद टहकदार सूरज निकलले। कई दिन के बरखा-बुनी के बाद समूचा धरतीए आज अँगड़ाई लेत रहे। रास्ता में जहाँ-तहाँ जवन किचिर-पिचिर भइल रहे, आज सूख गइला के उम्मीद रहे। टोला के लइका मछरी, घोंघा आ केकड़ा पकड़े निकल गइल रहलें सों। कहीं शीशैली गोली के खेल जम गइल तऽ कहीं चिक्का आ ठाढ़ी-टीका केऽ। पेड़न पर बइठल चिरइयो कुल चोंच से आपन पाँख साफ कऽ के आपन आलस भगावत रहली। माल-गोरू, सब देंह हिलाऽ-हिलाऽ के आपन मुर्चा छोड़ावत रहलें। सब कुछ ठीक रहे, सभे खुश रहे, बाकीर महंथ के चिन्ता बढ़त रहे कि संझा झोहे लागल, टोला के सभे आ गइल आ ललिता अभीन खेत से ना अइली। हिम्मत बटोरलन आ लाठी लेऽ केऽ चल दिहलन। घवरी खूँटवे पर से मुँह पगुरावत उनका के देखे लागल।
    महंथ खेत में पहुँच के देखलन तऽ ललिता मुड़ी पर साड़ी के कोना धऽ के खेत सोहत रहली। लगे जा के कहलन, - ‘घरे चले के अभीन बेरा नइखे भइल का होऽ? . . अब का बचल बा कि लागल बाड़ूऽ?’  
    ‘जवन गइल तवन आपन ना रहे बाकीर जवन बाँचल बाऽ ऊ तऽ आपन हऽ। . . सोचनी हँऽ कि ई पहीया पूरा कऽ दींऽ। . . कमजोरी के देंह। रउओ हार गइल होखेब। दू मिनट सुस्ताऽ लीं तऽ चलल जाला।’ 
‘हँऽ। . . कपार तऽ एतने में टनके लागल। . . ठीक बाऽ, . जल्दी करऽ।’
    महंथ बइठे के चहलन तऽ लागल कि मकई के पतइया बोलावताऽ। मोथ आ बजरा बतिआवे के चाहऽ तारें। रहरीआ के छोटका पौधवा अँकवार में भरेऽ के चाहऽता। उनकर आँख भर गइल। फफकऽ पड़लन। धीरे-धीरे आधा घंटा बित गइल। बीमारी वाला देंह, महंथ के सोंचते-सोंचत नींद आ गइल। नीद में एगो बड़ा भयानक भूत के देखलन। ओकर कुछ-कुछ चेहरा जाटा से मिलत रहुए। ऊ भूतवा कई गो हथियार लेहले रहुए आ हरिहर साड़ी में सजल एगो औरत के भगावत रहुए। ललिता जगवली आ देखल सपना पर चर्चा करत दूनो जना घरे चल दिहल लोग।   
    पति-पत्नी के साथ तऽ जीवन के मँहकदार बनावेला। भले महंथ आ ललिता के जीनगी में चाँद जइसन सूरत नाऽ उतरल तऽ का हऽ, एक-दूसरे के सुख-दुख बाँट के दूनो परानी बड़ऽ-बड़ऽ बिपत के ठेंगा देखावत आइल बाड़ें। दूनो जने आज ले अपने ओर से कुछ बिगाड़े के ना चहले आ दोसरा के बाउर नजर के भगवान के भरोसे छोड़ देलन। . . टोला में पहुँचते घेंवड़ा-तिरोई के साथे लौकी-कोंहड़ा के मँहक मन के मदहोश करे लागल। सबके घर पर एह घरी ईऽ मौसमी फरहरी के लत्तर देखे के मिलेलाऽ। केहू-केहू के आँगन में ललका पताका फहरावत महावीर जी के ध्वजा भी लउकेलाऽ। . . . दूनो जाने जब अपना दुआर पर पहुँचल लोग तऽ देखल लोग कि धवरी अपना गोंसया के जोहत-जोहत सुत गइल रहे। घास के बोझाऽ पटक के ललिता भीतर चल गइली। महंथ धवरी के उठाऽ के नाद पर बान्हें खातिर गइलन। ऊ नाऽ उठल। कई बेर जोर लगवलन के अहवा तऽ ना धऽ लिहलस, बाकीर ऊ मुँह से गाज फेंक के बड़का नींद में सुति गइल रहे। महंथ डेकरले। ललिता दउड़ली। टोला के लइका-सेयान आ मरद-मेहरारू भी आ गइल। जाटा भी अइले। आवते महंथ के कंधा पर हाथ धऽ के कहलन, - ‘हे भगवान, . . ई काऽ भइल प्रभु? . . आरे, धान कटले महंथ आ सजा मिलल धवरी केऽ?’
    महंथ जब जाटा के देखलन तऽ दूनो जने के नजर एक-दूसरे के मन के भाषा भी पढ़ लिहलस। महंथ खातीर जाटा के बात जरला पर नून मलत रहेऽ। कुछ कहले ना। सगरो बीख पीऽ केऽ रहि गइले। 
    महंथ के एह गाँव से अब एक दम चित्त फाट गइल। गाँव! जहाँ एह शब्द से सूखल मन भी हरिहर हो जाला। जवना शब्द के सुनतहीं मन में प्रेम, सद्भाव, सेवा आ समर्पन के मोहक इंद्रधनुष बन जाला, आज के ओह गाँव के माहौल अब अइसन क्लेश आ दुश्मनी के हो गइल। ऊ जानत रहले कि एह सब करनी के पाछे जाटा के हाथ बा, बाकीर मुँह से कुछ ना कहले। जाटा से खाली एतने कहलन, - ‘जाटा भाई, . . तूऽ हमार सगरो जमीन ले लऽ। अब हमनी के ईऽ गाँव में नाऽ रहेब जाऽ।’ 
    ‘एह तरे हिम्मत मत हार भाई! . . सब ठीक हो जाई।’
    ‘बड़ा मन मार के हमनी के ई नतीजा पर पहुँचल बानी जाऽ। . . ऊ मानुष तऽ सबसे अभागा होला, जवन अपना माटी के छोड़ेऽ। . . अरे, हम कहऽ तानी कि ई जमीन तहरा ढेर कामे आई। ले लऽ।’  
    जाटा आधा जमीन लेबे के तैयार भइलन। आधा परधान जी लेबे के कहले। जाए के तैयारी होखे लागल। महंथ ना जाने काहें हरदम मने मन कुछ सोचते रहेंऽ। सूख के कंडा हो गइले। जाटा जहीया जमीन लिखवले ओह दिन गाय के घीव में सँझवत जरवले आ आधा रात ले मछरी भुजाइल, पाउच फराइल।  
    आज ऊ दिन आइए गइल जब महंथ के ई गाँव के गोड़ लागे के बाऽ। उनका देंह में तऽ तनीको दम रहल नाऽ, से जाटा गाँव दू-चार गो छवारीकन के लेअइले आ बेरा कपार पर चढ़त-चढ़त सगरी सामान दूऽ गोऽ बैलगाड़ी पर लदाऽ गइल। गाँव भर के लइका-जवान, मरद-मेहरारू मजमा लगवले रहलें। सभे बड़ा दुखी रहे कि एगो सुख-दुख में साथ देबे वाला परिवार पराऽ ताऽ। कवनो मेहरारू के विचार रहे कि दैब अगर एगो सोंझो-टेढ़ लइका देहले रहते तऽ एह लोग के मन ना टूटीत। सबके आपन-आपन विचार रहे। सबके सब बात सुने तऽ सभे, बाकीर जवाब केहू ना देऽ। ललिता गाँव छोड़ला के कुफुत के साथे-साथे महंथ के बीमार शरीर से अउरी चिंता में रहली। कुछ बोलें तऽ हइए नाऽ, खाली लोर पोंछें। महंथ तऽ खाली टूकूर-टूकूर सबके देखें आ बेर-बेर धरती के गोड़ लागें।  
    बैलगाड़ी नधाए के भइल तऽ जाटा उठले, महंथ के काँख में हाथ लगा के लेअइले आ बइठा देहले। बैलगाड़ी पर सामान ढ़ेर रहे, से बैल जोरे ना मारेऽ सों। जाटा के तऽ लागल रहे कि केहू तरे हाली से ई लोग एह गाँव से विदा होखे लोग कि चादर तानाव। अपना ललका गमछा के पगड़ी बान्हत बैलन के हूरपेटे लगले। जोर ना लागल तऽ आगे से पालो उठाऽ के खींचे के जोर लगवले। जाटा जइसहीं जोर लगवले कि उनका ललका गमछी से दूनो बैल बिदक गइले सोंऽ। बँयवार तनी ढेर बिखिआह रहे। एक्के जोर में उनका के सींग से उठाऽ के दूर फेंकलस। गबरू-जवान जाटा हवा में नाचत जाके धवरी के खूँटा पर गिर गइले। सभे चिहाऽ के दउड़ल। महंथो धीरे-धीरे डेगत पहुँचलन।  
    धवरी के खूँटा से पेट फाट गइल रहे। जाटा ओल्ह गावे चल देहले रहले। ललिता तऽ देख के काँपे लगली। महंथ एगो लमहर साँस लेहले आ अपना गमछी से मुँह पोंछत बैलगाड़ी के लगे आ गइले। केहू के कहल सभे सुनल कि ‘हर करनी के फल एही जनमवा में भोगे के बाऽ ए भाई।’ 
                                           -----------
                                                                                   - केशव मोहन पाण्डेय

सोमवार, 17 अगस्त 2015

भोजपुरी लोकगीत में नारी


    भारतीय संस्कृति में हर प्रकार से विविधता देखल जा सकल जाला। ई विविधता भोजपुरी की गहना बन जाले। एगो अलगे पहचान बन जाले। इहे विविधते त अपना भोजपुरी संस्कृति के विशिष्टता देला आ अलग पहचान बनावेला। एह संस्कृति आ पहचान के कवनो बनल-बनावल निश्चित ढ़ाँचा में नइखे गढ़ल जा सकत। ई त बलखात अल्हड़ नदी जइसन कवनो बान्हो से नइखे घेरा सकत। ई त ओह वसंती हवा जइसन बावली, मस्तमौला आ स्वतंत्र ह, जवना पर केहू के जोर ना चलेला। अपने मन के मालीक। एह के कवनो दिशा-निर्देश के माने-मतलब पता नइखे। एह संस्कृति के केहू गुरू नइखे आ ना एह के कवनो बात के गुरूरे बा। ई त बस जन-मानस के अंतस से निकलल एकदम निरइठ आ पावन मानसिकता आ भावुक-सरस सोच को देखवेवाला हमनी के पहिचान ह। हमनी के त अपना सांस्कृतिक समृद्धि आ उपलब्धियन पर मुग्ध हो के खाली वाहवाही ना देनी जा, एकरा सथवे जीवन-जगत से ओकरा संबंध के आ अउरीओ तमाम सांस्कृतिक घटकन के आपस के संबंध के मन से जोड़बो करेनी जा। हमनी के समझबो करेनी जा।  भोजपुरी संस्कृति में संबंधन के दायरा खाली अपना कुनबा आ आसे-पड़ोस ले ना होला, दोसरो गाँव के लोग ‘फलाना’ काका, चिलाना चाचा, भाई आदि कहाला लोग। 
    पछीम के देशन में लिखित साहित्य के परंपरा रहल बा। ओहिजा बोलचारू साहित्य के परंपरा ना के बराबर बा। ओने के चिंतन आ अध्ययन लिखित दस्तावेज़ आ सबूत के आधार बनाके कइल जाला, जवना एकदम उचिते बा। प्रमाण से प्रमाणिकता सिद्ध होला। एकरा ठीक उल्टा अफ्रीका में वाचिक परंपरा भरपूर रहल बा, एकदमे समृद्ध, बाकीर ओहिजा लिखित परंपरा हइए नइखे। ओहिजा के अध्ययन खातीर मौखिक स्रोतन के सहारा लिहल ही उचित होई। भारत में लिखित आ लोक-संस्कृति के मौखिक परंपरा लगभग एक्के बराबर सशक्त आ समृद्ध रहल बा। एहिजा के पारिस्थितिक आ तार्किक दूनो संरचना के बीच स्पष्ट रूप से कवनो बँटवारा के लाइन तय नइखे कइल जा सकत। कुछ चीज अइसन अरूर बा जवना के पूरा-पूरा लोक चाहें शिष्ट परंपरा में रखल जा सकल जाता, बाकीर एह दूनों के बीच में ढेर चीज अइसन बा जवना के दूनों में से कवनो एक में ना राखल असंभव बा। हमनी के इहो इयाद राखे के चाहीं कि जवना चीज के आज निस्संकोच रूप से शिष्ट चाहे लिखित परंपरा में राखल जा सकल जाता, ऊ सब कबो कभी वाचिक परंपरा में रहल बा। 
    भारत के परिप्रेक्ष्य में देखल जाय त लोक आ लिखित परंपरा में रामायण-महाभारत के सैकड़ों रूप बा। लोक आ शास्त्र के गुणात्मक योग से फलित भक्ति साहित्य त एगो नया त्रिकोणे रच दिहलस। अगर लोक आ शास्त्रने के केंद्र मानल जाव त ई कुल रचना एह दूनो केंद्रन के बीच एह ढंग से स्थित बा कि लोक-मर्मज्ञ एहके लोक-परंपरा के ज्ञान अउरी साहित्य के लिखित रूप करार देंला लोग आ शास्त्र-ज्ञानी एही रचनन के शास्त्रीय ज्ञान अउरी शिष्ट साहित्य के लोकोपयोगी संस्करण कही लोग। मनुष्य त सामाजिक प्राणी ह, बाकीर आदमी के सगरो सपना, सगरो इच्छा समाज आ इतिहास में पूरा ना होला। आदमी के सपना आ ओकर इच्छा समाज अउरी इतिहास से प्रभावित त होला, बाकीर  समाज अउरी इतिहास से बान्हाइल ना रहेला। एही से त आदमी ‘स्वप्न लोक स्रष्टा’ ह। इतिहास के कवनो काल-खंड होखे चाहे समाज में फइलल कवनो विचारधारा, स्त्री-पुरुष, नर-मादा, मरद-मेहरारु में भेदभाव साफ-साफ लउकेला। जहवाँ पुरुष अपना सपना पर नगर, महल, स्मारक आ नया-नया राजवंशन के उदय करत रहल बा, ऊहवें औरतन के सपना आ इच्छा लोकगीतन में दर्ज होत रहल बा। एक अर्थ से लोक-साहित्य अउरी समृद्ध भइला के साथे-साथ प्राचीनो भइला पर ई नया चिंतन के केंद्र बन जाला। 
    हम अपना बाप-महतारी के सबसे छोटका संतान हँई, जवना कारने ओह लोग से हमार सन्निकटता उनका प्रौढ़ा अवस्था से उनका वृद्धा अवस्था ले बनल रहल। हम कई बेर अनुभव करीं कि माई जब कवनो विषम परिस्थिति में पड़ जाव तब गीत गावे लागें। ओह बेरा माई के गीत खाली गीत ना हो के उनका अंतर के पीड़ा होखे। हमके साफ-साफ ईयाद बा कि ऊ गीत गावत कम, गीत रोअत अधिका लागें। कवनो विषम-परिस्थिति में ऊ अपना के द्रौपदी लेखा प्रस्तुत करत गावे लागें -
अब पति राखीं ना हमारी जी, 
मुरली वाले घनश्याम।।
बीच सभा में द्रोपदी पुकारे
चारू ओरिया रउरे के निहारे
दुष्ट दुशासन खींचत बाड़ें
देहिंया पर के साड़ी जी, 
मुरली वाले घनश्याम।।
   जब माई हमरा के सुतइहन तब लगभग हमेशा गीत गइहें। उनका गीतीया के बोलवे से हमरा लइका मन के बुझा जाव कि उनका मन में एह बेरा हर्ष-उल्लास, पीड़ा-वेदना, ममता-दुलार आदि कवना भाव के अधिकता बा। जब ऊ सहज रहिहें तब आपन सबसे प्रिय गीत जवना में सिंगारों रहे, प्रेमों रहे, ऊहे गीत गइहें -
अजब राउर झाँकी ये रघुनन्दन।।
हिरफिर-हिरफिर ईहे मन करेs 
रउरे ओरिया ताकी ये रघुनन्दन। 
अजब राउर झाँकी ये रघुनन्दन।।
मोर मुकुट, मकराकृत कुण्डल
पैजनिया बाजे बाँकी ये रघुनन्दन।
अजब राउर झाँकी ये रघुनन्दन।।
     हमरा त लोकगीत आ लोक-साहित्य के समृद्धि में सबसे अधिक औरतने के योगदान बुझाला। उदाहरण के रूप में हम अपना माई के ईयाद क के कहीं त कवनो परब-त्योहार के बेरा जब भैया लोग घरे ना पहुँचे लोग चाहें आवे में देरी हो जाव त हमार माई पूरा के पूरा कौशल्या बन जासु। ऊ कौशल्या, जेकरा राम लोग के समय रूपी कैकेयी वन में भेज देहले बिया। ओह बेरा त माई गावते-गावते इतना रोअस कि अवजवे बइठ जाव, - 
केकई बड़ा कठिन तूँ कइलू 
राम के बनवा भेजलू ना।  
हो हमरो केवल हो करेजवा 
तुहू काढियो लेहलू ना। 
हमरा राम हो लखन के 
तुहू बनवा भेजलू ना। 
हमरा सीतली हो पतोहिया 
के तूँ बनवा भेजलू ना। 
केकई बड़ा कठिन तूँ कइलू 
राम के बनवा भेजलू ना।।
     ओह बेरा हमहूँ उनका से छुप के उनका दर्द भरल गीतन के सुनीं आ पलक से टपके खातीर तइयार भइल लोर के पोंछ के कतहूँ दूर हट जाईं। लोकगीतन के बेर-बेर सुनके आ ओहमें आइल मुद्दन पर उनकर सोच आ संवेदना के त ना, बाकीर अपना माई के एगो केंद्र मानके बहुत कुछ समझले बानी। हमरा पूरा विश्वास बा कि लोकगीतन के मरम समझे वाला हर आदमी अइसने अनुभव से गुजरत होई। औरतन द्वारा गावे वाला लोकगीतन के स्वभाव ह कि ओहमें बहुते बड़को बात अक्सर कवनो साधारण घटना-प्रसंग के जरिए, बाकीर अनुभूति के गहनता से कहल जाला। गीतन के अंत में एकाध गो अइसन पंक्ति आ जाला, जवना से पहिले के साधारण घटना-प्रसंगों असाधारण रूप से महत्वपूर्ण बन जाला। लोकगीतन में जीवन-जगत के बड़का-बड़का तथ्य वस्तुनिष्ठ सहसंबंधन के बहाना से कहल जाला। आज के औपनिवेशिक आधुनिकता के पहिले सृष्टि आ समाज त का, परिवार के भारतो के अवधारणा खाली मनुष्य पर केंद्रित नइखे रहि गइल। ओह बेरा त आदमी के भौतिक सुख-समृद्धि खातीर खाँची भर प्राकृतिक उपादानन के बेहिसाब दोहनो के परंपरा नइखे, बाकीर प्रकृति के अवयवन के साथे प्यार, पारस्परिकता आ सहनिर्भरता के जीवन जीए पर जोर रहल बा। एही कारने त अपना किहा गंगा मइया बाड़ी, विन्हाचल देवी बाड़ी आ लगभग सब जाति-प्रजातिअन के पेड़न पर कवनो ना कवनो देवता के वास आ घर-दुआर मानल जाला।  
    भले केहू हिम्मत क के दिल खोल के आ जबान के ताला तुर के स्वीकार ना करे, बाकीर आजुओ ढेर लोग बा कि जब घर में बेटी के जनम होला त ओह लोग के लागेला कि जिनगी में अन्हार हो गइल। महतारी बनल औरत अपनही के कोसे लागेले कि अगर ऊ जनती कि बेटी होई त कवनो जतन क के ओह मासूम के कोखिए में मार देती। बेटी के जनम के खबर पा के बाप मुँह लटकवले, मुरझाइल घूमे लागेले। ई सब औरतन के गीतियन में देखे के मिलेला - 
जब मोरे बेटी हो लीहलीं जनमवाँ
अरे चारों ओरियाँ घेरले अन्हार रे ललनवाँ
सासु ननद घरे दीयनो ना जरे
अरे आपन प्रभु चलें मुरुझाइ रे ललनवाँ।
     अब पूरा के पूरा ई बुझाए बनेला कि समाज में बेटी के जनम से दुखी भइला पर, एह के खराब माने के आदत के एगो सीमा से अधिका बढ़े से रोके खातीर ओही समजवा के भीतरीये एगो लोक-विश्वास उभरेला। लोग के बुझइबे ना करे ला कि बेटी जनमला पर बाप-महतारी चाहे कुल-खानदान के लोग के लोग दुखी काहें होलें? चिंता काहें करेंले? एहके बिना जनले एह मुद्दा से कवनो लेखां न्याय नइखे हो सकत। ई चरचा आगे कइल जाई, जब एह कारन के साफ करे वाला परिस्थिति साफ हो जाई। वेटी के जनमला पर ओकरा के मारे के कोशिश चाहें अभिलाषा कवनो गीतन में ना मिलेला। जनमला के बाद बेटियो माई के कोख से जनमल, ओकरे खून-दूध से सीरजल आ पैदा भइल एगो संतान होले। ऊहो एगो बेटे जइसन अपना बाल-लीला से बाप-महतारी के करेजा जुड़इबे करेले। ओकरा प्यार-दुलार में बाप-महतारी जीवन की सगरो पीड़ा, भले तनीए देर खारीरा, भुला जाले।  
ई सब भारतीय परंपरा से मान्यता प्राप्त संवेदना आ भावना हवे। आधुनिकता के अइला के साथही एगो आदर्श भारतीय परिवार के आदर्श स्त्री बनावे के अभियान के साथ ही संवेदना आ भावना घटल बा। भावना स्त्री बनवला के, भावना लोक-गीतन के। समय के साथे चले के होड़ लगावत आज के आदमी तर्क चाहे कुछू कहे बाकीर लोक-जीवन, लोक-साहित्य आ लोक गीतन के स्वरूप त विकसिते भइल बा। समृद्धे भइल बा। लोक-गीत आ लोक-अस्तित्व आधुनिक तार्किक सोच के परिणाम ना ह। एकरा के त बरीसन पहिले परिभाषित आ पोषित कइल गइल बा। ऋग्वेद के सुप्रसिद्ध पुरुष सूक्त में ‘लोक’ शब्द के व्यवहार जीवन आ जगह दूनों के अर्थ में कइल गइल बा। -
नाभ्या आसीदंतरिक्षं शीष्र्णो द्यौः समवर्तत्।
पद्भ्यां भूमिर्दि्दशः श्रोत्रात्तथा लोकां अकल्पयन्।।
एह तरे के अनगिनत उदाहरणन से साफ हो जाता कि सामान्य जीवन आ स्थान से जुड़ले संगीत के लोक-संगीत कहल जाला। लगभग सब भाषा आ बोलियन के अधिकांश लोक-संगीत लिखित कम, मौखिक ढेर बा। गायन के विरासत के रूप में लोक-संगीत कई पीढ़ी से आवत जन-जीवन के दर्पण होला। जनता के हृदय के उद्गार होला। 
गँव-जवार के लोग संस्कार, ऋतु, पूजा-व्रत, अउरी दोसर कार्यकलापन आदि के अवसर पर जब अपना मन के भावना के उद्गाार गा के करे ला लोग त अइसही लोक-संगीत के सृजन हो जाला। लोक-संगीत सभ्यता, संस्कार आ समाज के समृद्ध करे के साथे-साथे बोली, भाषा आ भावो के एगो अलगे पहचान देबे में सक्षम होले। भोजपुरी लोक-संगीत के त अपना सरसता, मादकता, समृद्धि, उन्माद, अपनापन, ठेंठपन आदि के कारने सबसे समृद्ध कहल जा सकल जाता। जन-जन में अपना प्रचुरता, व्यापकता आ पइठ के कारने भोजपुरी लोक-संगीत के प्रधानता स्वाभाविक बा। 
मजूरी कई के 
हम मजूरी कई के 
जी हजूरी कई के 
अपने सइयाँ केऽऽ 
अपने बलमा के पढ़ाइब
मजूरी कई के।।
भोजपुरी पुरूब के बोली ह। पुरूब! जहवाँ के माटी सदानीरा नदियन के तरंगन आ रस से हमेशा आप्लावित रहेले। जब मटिए सरस होई त संगीत के सुर में निरसता कहाँ समाई? जब सरसता, मादकता, सुन्दरता, प्रेम, ममता, समर्पण, परिश्रम, जीवटता, जीवन आदि के बात आई त जीवन देवे वाली, जीवन भोगे वाली आ जीवन बनावे वाली नारी के तरे बँच जाई? --- नारी त जीवन के आधार होले। लोक-संस्कृति, लोक-संस्कार, लोक-जीवन नारीए से जीअ ता, त लोक-संगीत ओह देवी के बिना के तरे हो सकेला?
कुछ साल पहिले के बात ह, हम अपना शहर में हमेशा सिनेमा देखे जाईं। एगो चित्र मंदिर में त लाम-नियर एक बरीस से सिनेमा शुरू भइला के पहिलवाँ एगो विज्ञापन हमेशा देखावल जाव। हम ओह विज्ञापनवा के देख-देख के अकुता गइल रहनी बाकीर ओकरा शब्दन में डूब गइल रहनी। वाॅयस-ओवर के एकहक शब्दवा हमरा भेजा में चित्र बनावे लागे। ‘नारी! प्रकृति की अनुपम कृति। प्रेम और सौंदर्य की प्रतिमूर्ति! --- ममता और स्नेह का साकार रूप।’ 
तब जयशंकर प्रसाद जी के लाइन जीभ पर जुगाली करे लागे - 
नारी तुम केवल श्रद्धा हो,
विश्वास रजत नग-पद-तल में।
पियुष-स्रोत सी बहा करो
जीवन के सुन्दर समतल में।।
नारी चर्चा के बिना कवनो देश, समाज आ वातावरण के लोक-संगीत के जीरो आ खार कहल जा सकल जाता। भोजपुरियो-संगीत में नारी के अनगिनत रूपन के चर्चा का बरनन देखल जाला। भोजपुरी के सिंगार, करुणा, वीर, हास्य, निरगुण संगीत होखे चाहें आजु काल्ह के फिल्मी ठुमका, सगरो झाँझ, पखावज, हारमोनियम, बैंजू, गिटार नारीए के आगे-पाछे अपना सुर के साधना करत लउके ले। सोहर में नारी के एगो रूप देखीं -
मचीया बइठल मोरे सास
सगरी गुन आगर हेऽ।
ए बहुअर, ऊठऽ नाही पनीया के जावहु
चुचुहीया एक बोलेलेऽ हेऽ।।
भोजपुरी लोक-संगीत में बरनन चाहे ऋतुअन के होखे, चाहे ब्रत के, चाहें देवी-देवता के, चाहें संस्कार के, जातियन के होखे चाहें मेहनत-मजुरी के, हर संगीत में नारी के सगरो रूप को पावल जा सकता। भोजपुरी लोक-संगीत आल्हा भले वीर रस से सराबोर रहेला त का ह, नारी विवशता, अधिकार, सुन्दरता आ समर्पन के बहाने लउकीए जाले, - 
जाकी बिटिया सुन्दर देखी, ता पर जाई धरे तरवार।।
या
चार मुलुकवा खोजि अइलो कतहु ना जोड़ी मिले बीर-कुँअर
कनिया जामल नैनागढ़ में राजा इन्दरमल के दरबार
बेटी सयानी सम देवा के बर माँगल बाघ झज्जार
बडि़ लालसा बा जियरा में जो भैया के करों बियाह
करों बिअहवा सोनवा सेऽ -----।।
फगुआ आ चइता के शब्द त जइसे नारीन से जनमल बा, -
गोरी भेजे बयनवा हो रामा
अँचरा से ढाकि-ढाकि के।।
सावन के हरिहरी में सगरो भोजपुरिया धरती लहलहात रहेले, तब कवनो नवही मेहरारू अपना सुहाग से दूर ना रहे के चाहे ले। कजरी के गीतन में नारी के प्रेयसी स्वरूप के देख के केवर मन ना द्रवित होई, -
भइया मोर अइलें बोलावे होऽ
सवनवा में ना जइबें ननदी।
चहें भइया रहें चाहें जाएँ होऽ
स्वनवा में ना जइबें ननदी।।
भोजपुरी-क्षेत्र में मनावे वाला सगरो ब्रत-त्योहारन में नारी के पावन रूप के बरनन अपने आपे लउक जाला। व्रत-त्योहार त वइसही स्त्री के निष्ठा के प्रतीक ह। त फेरू ओहसे नारी अलगा के तरे हो सकेले? भोजपुरी माटी के सबसे पावन व्रत छठ में करुणा से सनाइल, छठ माता के आशीष पावे के आग्रही एगो नारी के चित्रण देखीं, -
पटुका पसारि भीखि माँगेली बालकवा के माई
हमके बालकऽ भीखि दींहि, ए छठी मइया
हमके बालकऽ भीखि दींहि।
निर्गुण में त नारीए आत्मा बन जाले। ऊहे वाचको रहे ले, ऊहे याचको रहेले। दाता और भिखारी, सब नारीए रहेले, -
जबसे गवनवा के दिनवा धराइल
अँखिया ना नींद आवे
देंह पीअराइल।।
हम कह सके नी कि नारी चइता के बिरह ह। ऊ लोरी के थाप ह। नारी निरगुन के सब छंद ह। ऊ कँहरवा के कलपत पीड़ा ह। पचरा के झूमत भक्तिन ह। आल्हा के मर्दानी अवतार ह। नारी फगुआ के मांसल मतवना ह। छठ के समर्पित सुशीलता ह। ऊहे विदाई की लोर ह। सोहर के सद्यः-प्रसूता माई ह। बिरहा के अलाप ह। झूमर के भाव व्यंजना ह। जँतसार के ध्वनि पर नाचत रगवो नारीए ह। नारी बारहमासा के वर्णन ह। निर्धनता के आह नारीए व्यक्त करे ले। रिश्तन के सगरो डोर नारीए सम्हारे ले। भोजपुरी के कवनो लोक-संगीत के बात कइल जाव, नारीए के रूप पहीले झलकेला। ननद-भौजाई के टिभोली होखे चाहें सास के शासन, देवर के छेड़छाड़ होखे, चाहे जेठ के बदमाशी,  नारी के खाली उपस्थितिए से लोक-संगीत में इनकर बरनन संभव होखे ला। 
कुँआर लड़की भाई के शुभ के खातीर कातिक में पिडि़या के व्रत रहेली सों त महतारी लोग अपना पूत के रक्षा खातीर जिउतिया। मेहरारू अपना सुहाग के रक्षा खातीर तीज व्रत रहली सों त एही तरे औरतन में बहुरा आ पनढरकउवा जइसनका ढेर व्रत-त्योहार देखल जाला। नारीए के माध्यम से भोजपुरी लोक-संगीत में जन-जीवन के आर्थिको पक्ष के झाँकी प्रस्तुत हो जाला। देखीं ना, -
सोने के थाली में जेवना परोसलों,
जेवना ना जेवें अलबेला,
बलम कलकत्ता निकल गयो जीऽऽ।
    भोजपुरी लोक साहित्य में नारी के जवन चित्रण कइल गइल बा, ऊ मांसल, मादक आ आकर्षक भइला के साथे-साथे रसदार, शिष्ट आ सभ्यो बा। पति-पत्नी, भाई-बहीन, माई-बेटी, ननद-भौजाई, सास-पतो हके जवन बरनन हमनी के सामने मिलेला, ओह से समाज में नारी के अनगिनत चित्र अंकित हो जाला। नारी के जवना रूप के शुद्ध आ सत्य बरनन भोजपुरी लोग-संगीत में पावल जाला, ऊ दोसरा जगे दुर्लभ बा। 
    समय के साथे बदलाव के बयार के गंध सभे सूँघता। भोजपुरी के लोक-संगीतो ओह से अछुत नइखे। व्यावसायिकता आ बाजारू संस्कृति लोक-संगीत के कुछ रंगीन क देहले बा। भोजपुरीओ लोक-संगीत पर आधुनिकीकरण के मुलम्मा चढ़ाके बाजार में परोसल जाता। मांसलता के वर्चस्व के साथही रसदार रूपो के बिसारल जाता। भोजपुरी जइसन गंभीर आ समृद्ध भाषा के दूषित कइल जाता। भोजपुरी भाषा, भाव आ संगीतो में रोज नया-नया जीए-खाए आ दू पइसा कमाए के अवसरो सृजित कइल जाता। नारी के अनेक रूपन के बरनने से भोजपुरी के लोक-संगीत के अतीत त समृद्धे बा, वर्तमानो में रोजगार के अवसर उपलब्ध हो ता। एह आधार पर कहल जा सकता कि अगर अपना जबान आ कलम पर संयम रहल त आवे वाला आपनो काल्हू बड़ा उजर बा। ई त सचहूँ कहल गइल बा कि हर सफलता के पाछे एगो नारीए के हाथ रहेला। एकरा के मानला के साथही स्वीकारो करे के क्षमता राखे के पड़ी। नारीए से त ई सृष्टि बा।

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                                                                          - केशव मोहन पाण्डेय